जीवन मृत्यु दोनों निश्चित है जीवन के उपरांत सांसारिक गतिविधियों में व्यक्ति की पहचान का जो संदर्भ होता है वह उसके क्रियाकलाप से तय होता है। माता जी की आरंभिक शिक्षा की कोई जानकारी नहीं है लेकिन जिस समय और परिवेश में वो डॉ मनराज शास्त्री जी के साथ आई और जीवनसंगिनी बनी वह दौर इसी तरह के पारिवारिक संबंधों के लिए उचित और उपयुक्त था।
जैसा की सर्वविदित है डा.शास्त्री संस्कृत विषय के साथ साथ अन्य सामाजिक विषयों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विद्यार्थी रहे हैं उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही अपने समय की व्यवस्थाओं को समझा और बहुत सारे सामाजिक सुधार के कार्य किए और निरंतर कर रहे हैं आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यदि माताजी आधुनिक दौर की उन तमाम अवसरवादी और चालाकी के मध्य बड़ी हुई होती तो क्या आदरणीय शास्त्री जी का योगदान इतना महत्वपूर्ण होता अलग-अलग तरह की मान्यता हो सकती है कि शायद ज्यादा होता और शायद बिल्कुल ना होता हालांकी दोनों तरह की स्थितियां बन सकती थी लेकिन मेरा मानना है कि जिस स्वच्छंदता के साथ वह सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्शों को आगे बढ़ाते रहें निश्चित तौर पर उसके पीछे माताजी की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही है। दोनों तरह से उन का योगदान देखा जा सकता है।
सादगी और भव्यता की उनकी वैचारिकता हमेशा स्मरणीय रहेगी।






























