रचनाएँ

कैप्शन : 8 अप्रैल प्रातः 6 . 55 

लड़ते हैं आपस में ईश्वर और अल्लाह के बंदे। 

आसमां में कभी उनकौ लड़ते देखा है अंधे।।

कैप्शन : 07 अप्रैल सायं ; 07.55 

परम प्रिय अखिलेश जी! 

राष्ट्रीय अध्यक्ष ,समाजवादी पार्टी

परिवार के सदस्यों की अतिशय महत्त्वाकांक्षा के चलते आप की राजनीति में कांटा लगने वाला है। त्याग की भावना का सदस्यों मेंअभाव है। आप को सामंजस्य बैठाना है। अगर सामंजस्य नहीं बनता है तो निर्मम बनना पड़ेगा और जनता आप का साथ देगी,बशर्ते उचित भागीदारी को प्रश्रय देंगे। कृष्ण की मुस्कान ही नहीं, बलराम का क्रोध भी चाहिये।

कैप्शन : 07 अप्रैल सायं ; 03.15 

अपने रास्ते से हटने के बहाने अनेक होते हैं।सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते लोग फिसल जाते हैं।

कैप्शन : 07 अप्रैल प्रातः  09 .15 

जितने झूठे कथन (false narratives) संघ और भाजपावाले गढ़ते हैं,उतना कोई और नहीं।खूबी यह है कि गोदी मीडिया के साथ मिलकर इसकादोष दूसरों पर मढ़ देते हैं।आरक्षण के संबंध में मोदी का झूठ स्वत: उजागर हैं।जब सरकारी संस्थायें नही रह जायेंगी और उनका निजीकरण हो जायेगा ,तब आरक्षण कहां रहेगा,मोदी जी।निजी संस्थाओं में आरक्षण होता नहीं। दूसरे,आप ने आरक्षण को समाप्त करने के लिये

लेटरल एंट्री का चोर दरवाजाभी खोल दिया हैं।मोदी जी! आप अपने को बहुत चालाक समझते हैं,हमारे गांवों में ऐसे चालाक लोगों को घाघ धूर्त कहा जाता है।

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पिछड़े दलित आदिवासी बाजारों में धन का प्रबंध करके दुकानें खोलें और आपस में ही खरीद- बिक्री करें ताकि समय आने पर इनका बहिष्कार किया सके! बनियों का सारा व्यापार हमसे चलता है और ये ब्राह्मणों के साथ मिलकर हमारा विरोध करते हैं! हमारे  खिलाफ भारतबंद.कर रहे हैं!अब हमें हर बात के लिये तैयार रहना होगा! जबतक इनका बहिष्कार नहीं होगा,ये हमको दबा कर ही रखेंगे!

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मेरा वदन सहला कर चला गया,मुझे पता नहीं, हवा के सिवा और भला कौन हौ ही सकता है यहां।

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राजनीति की बलि चढ़ते नौजवान,२०१४ के बाद का सवाल?

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मोदी जी ! मेट्रो में दो गज की दूरी को पलीता लगता है,के और न ही मजबूरी?

कैप्शन : 06 अप्रैल 2021 


श्री विजेंद्र यादव की पोस्ट साझा की 


हिन्दी के एक अध्यापक से बातचीत

भक्तिकाल, सांस्कृतिक नाश का काल है। जो लोग भक्तिकाल को 'सांस्कृतिक जागरण' मानते  हैं, वे लोग भी (भाजपा की बढ़त और मोदी की पैदाइश से बढ़कर) समाज में फैलते जा रहे लम्पटीकरण के उत्तरदायी हैं।

यह सुनकर माटसाब ने कहा कि हम तो समाजसेवा कर रहे हैं।

हमने कहा, समाजसेवा सचेत-स्वतंत्र आदमी का काम होता है। नौकर कभी समाजसेवा नहीं करता। ग़फ़लत में रहने की ज़रूरत नहीं है। जो मास्टर 'नाश' को 'जागरण' बता रहा है, वह विद्यार्थियों को उल्टा लटका रहा है, वह ख़ुद भी लटका हुआ है। वह समाज के ख़िलाफ़ काम कर रहा है। वह इतिहास के ख़िलाफ़ काम कर रहा है।

नाश का मतलब ह्रास की शुरुआत काफी पीछे से हो चुकी थी। राम और कृष्ण को अवतार बताकर शक्ति शील सौंदर्य के जो प्रतिमान खड़े किये गये, वह बाकायदा वैचारिक ठगी का मामला है। विरोधियों को भी बताया गया कि भजन कर रहे थे, वे भी भक्त थे, वे भी भगवान का ही नाम ले रहे थे। अवतारवादी दर्शन की यह प्रभुता बुद्ध के देश में सांस्कृतिक तख़्तापलट की कार्यवाही थी।

हिन्दी साहित्य का शिक्षण तंत्र जिन भक्तों का थोक उत्पादन कर रहा है, किया है, वे सनकी बौड़म एकदिन समाज के कपार पर चुरेंगे - यह बात कई लोग कह चुके हैं जिनमें एक परसाई जी भी हैं।

उन्होंने कहा, मतलब ?

हमने कहा, पिटाई खाने के लिए तैयार रहिए। जो 'समाजसेवा' आप लोग कर रहे हैं उसकी यही 'उपलब्धि' है। 'आपन तेज सम्हारो आपै'। 

लेकिन हमने तो यही पढ़ा है, यही हमें पढ़ाया गया है, हम क्या करें, उन्होंने भोलेपन से कहा।

हमने कहा, बाबूगिरी और मास्टरी में अंतर है। अगर आपकी इतिहास चेतना काम नहीं कर रही है तो मास्टरी काहे ला कर रहे हैं। चूँकि आपको नहीं पता कि आपने क्या पढ़ा है, आपको नहीं पता कि आप पढ़ा क्या रहे हैं इसलिए आपको यह भी पता नहीं पड़ेगा कि समाज में इतने गुंडे कहाँ से बढ़ते चले आ रहे हैं। होनहार, देशभक्त, माता के मुरीद, बौड़म।

यानी पिटना तय है?

हमने कहा, बिल्कुल। व्यक्ति को बरी करना चाहते हैं तो कहिए सलेबस की समस्या है, आलोचना का दोष है। लेकिन मास्टर को बरी नहीं कर सकते। मास्टरी का मामला थोड़ा अलग है। मास्टरी सबके वश की चीज़ नहीं हो सकती।

सलेबस में क्या समस्या है - उन्होंने पूछा।

हमने कहा - हिन्दूवादी राष्ट्रवाद। हिन्दी का मास्टर हिन्दूवादी भ्रष्ट चेतना के कैरियर है - यह बात आपके संग्यान में होनी चाहिए कि आप समाज में गंदगी बढ़ा रहे हैं जो दृष्टि, बोध से मूल्य स्तर तक पहले ही गचागच फैली हुई है ? आपके वैचारिक दृष्टिहीनता की जड़ ब्राह्मणी सामंतवाद है।

मसअला हिन्दू का है। इस पर गौर करने की ज़रूरत है। छह साल से तो खुलेआम चल रहा है। क्या वजह है कि उनका प्रचार तंत्र इस दर्जा सफल है कि आप दुष्प्रचार का जवाब भी ठीक से नहीं दे पा रहे हैं, अपने पक्ष का प्रचार करने को कौन कहे। आप हिन्दूवाद को क्यों समझना नहीं चाहते? आप हिन्दू की ठगबाजी का सामना क्यों नहीं करना चाहते? छह साल से फुटहा बाजा बज रहा है, आप न उसका काम देख रहे हैं, न उसका भाषण सुन रहे हैं, बर्बादी का विकास कौन देखेगा? आप भारत की संस्कृति-परम्परा को नहीं बूझ पा रहे तो विद्यार्थियों से क्या अपेक्षा करें?

वे दिन गए जब सत्ता के संस्थानों में बैठकर वामपक्ष का बेड़ा गर्क किया गया। लोग प्रगतिशील भी बने रहे। आज की तारीख में मास्टरी करना है तो विपक्ष में खड़ा होना पड़ेगा। प्रगतिशील होना है तो इस पूँजीवादी सत्ता और इस मनुवादी सलेबस के ख़िलाफ़ खड़ा होना पड़ेगा - सशरीर। नौकर कभी मास्टर नहीं हो सकता। जिसको गुरू कहते हैं वह गुरू कहलाता ही इसलिए है वह हिन्दू के नाम पर थोपे गये भक्ति भजन भगवान का विरोधी था।

ऐसा नहीं है कि प्रगतिशीलता का डिपार्चर प्वाइंट बदल गया है, बात यह है कि पिछली पीढ़ी के पहरेदारों ने जिस तरह सरकारी गुलगुला चभका है, उसका नतीजा यह पीढ़ी भुगत रही है। आगे और दुर्गति धरी है।

कबीर और तुलसी दोनों यदि प्रेम की धारा बहाएंगे तो पिटने की वजह भी सपष्ट नहीं हो पाएगी। संकट इतना विकराल है कि अध्यापक को नहीं पता कि वह भीड़-तंत्र पैदा कर रहा है, कि उसके पाठ्यक्रम का लक्ष्य आवारा-लुच्चा तैयार करना है; विद्यार्थी को नहीं पता कि पढ़ाई क्या है, नौकरी क्या है, भक्ति क्या है, देशभक्ति क्या है। गुरू जब ख़ुदै हक़ीक़त का सामना नहीं कर रहा है, बल्कि शासकवर्गीय प्रपंच में भरमा पड़ा है, तो रैदास, मलूकदास की विशेषता कौन बतावेगा। 

भक्तिकाल का मुख्य अन्तर्विरोध भक्ति-भजन-भगवान है। हिन्दी आलोचना ने समर्थन-विरोध को एक ही धार में तौलने के लिए क्या क्या पैंतरा चला है, देख लीजिए। सामंत बनाम किसान, सवर्ण बनाम शूद्र, लोक बनाम शास्त्र। ईश्वर के सम्मुख जो बराबरी बताई जाती है, वह एक छल है, कवियों ने अपनी बात कहा भी है, लेकिन आलोचना को तो जागरण दिखलाना था, हक़ीक़त जो भी हो।

वे लोग भी तो प्रगतिशील कहलाते हैं जो भक्तिकाल को जागरणकाल मानते हैं ?

हाँ हाँ, इन्हीं लोगों ने तो कोढ़ में खाज फैलाया है। ये लोग रूलिंग क्लास के बाबू ठहरे। नौकरी का दाम अदा किये हैं। वे वस्तु-तथ्य से नहीं, अखण्डता-महानता की धारणा से संचालित हैं। नतीजा यह है, ऐसी फँसान खड़ी हो गई है कि माटसाब! आप खुद भी चाहें तो अपने को पिटने से नहीं बचा सकते। सरकारी गुलगुला खाकर जो तथाकथित प्रतिरोध आप लोग कर रहे हैं, आपके जो तथाकथित सामाजिक सरोकार है, क्षमा दया के आपके जो आत्मघाती संस्कार हैं, उधर यह देश बिका जा रहा है, इधर आप समाजसेवा कर रहे हैं, क्या पढ़ा रहे हैं आप, बच्चों को अँधेरे में ढकेल रहे हैं, भक्ति को जागरण बता रहे हैं, शासक वर्ग का कूड़ा ढो रहे हैं, आपको शर्म भी कहाँ से आएगी!

नयी पीढ़ी का जो हाल है, इसका जिम्मेदार कौन है, इसका ठींकरा केवल मोदी के सर नहीं फोड़ सकते। इस भीड़-तंत्र की पैदाइश में आपका भी किरदार है। भीड़-तंत्र का जो सिपाही है वह केवल बौड़म नहीं नहीं होता, वह सधा हुआ बौड़म होता है। ज्ञान, सत्य के हर अँखुए को चबा जाएगा वो। समझ लीजिए, मरवाने के अलावा अब दूसरा कोई रास्ता नहीं बच रहा आपके पास। आप लोगों में भी, सबसे पहले उनका नम्बर आएगा जो शांतिपूर्ण भेदभाव के हिमायती हैं या कहिए सचेत होने की दिशा में हैं।

इसका मतलब, मैं भी भीड़-तंत्र का हिस्सा हूँ क्या? अब रास्ता क्या है - उन्होंने हताश स्वर में पूछा।

हमने कहा, एक तो ब्राह्मणी हिन्दूवाद की मर्यादा- प्रतिष्ठा बताने वालों को ठीक करना होगा। दूसरा, 'साँचाबद्ध चिंतन' के विरोधियों का दिमाग़ सही करना होगा। तीसरी, सबसे ज़रूरी बात कि इतिहास - दृष्टि को जगाना होगा ... लेकिन समझने का चक्कर छोड़िए, आपको बता दिया जाएगा तो भी आपके भेजे में कुछ हलेगा नहीं। आन्दोलन आपकी समझ में तब भी नहीं आएगा जब आपकी संस्था का निजीकरण हो जाएगा।

हमारी आपके साथ पूरी सहानुभूति है माटसाब ! हम तो कहेंगे कि होश में रहकर काम कीजिए ताकि बढ़िया से मराइये। आपका पिटना मुद्दा बन जाएगा तो इधर से रास्ता बनेगा। आपकी पिटाई में ही अब आपकी भलाई है। साहित्य की, समाज की, भविष्य की भलाई के लिए अब आपकी पिटाई ज़रूरी है। आप रास्ते की बात कर रहे थे न ! इसलिए सही मुद्दे का ख़्याल कीजिये। राजनीति बूझिये। क्लास को आपरेट करते हुए देखिये। साहित्य, वर्ग विभाजित समाज का आईना है। 

इसी के साथ हम दोनों उठ खड़े हुए।

कैप्शन : 06 अप्रैल 2021

उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NSA के 120 में से 94 केस निरस्त कर दिया।इससे योगी सरकार की निरंकुशता उजागर हो गई।

आत्मनिर्भर भारत का एक मतलब है प्राचीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर लौटना।

वित्तमंत्री सीतारमण ने गरीबों की‍ जमापूजी पर ब्याजकटौती की‌ जो कैंची चलाई थी,उसे डर कर वापस ले लिया। ओवरसाइट का बहाना बनाना पड़ा।

संस्कृतियां 

भारत में दो संस्कृतियां हैं, इनके नाम भिन्न भिन्न हैं। जैसे आर्य संस्कृति- द्रविड संस्कृति,ब्राह्मणसंस्कृति- श्रमण संस्कृति,अर्जक संस्कृति- अनर्जक संस्कृति,शोषक संस्कृति- शोषित संस्कृति,पूंजीवादी संस्कृति- समाजवादी- साम्यवादी संस्कृति,बहिरागत संस्कृति- मूलनिवासी संस्कृति,आर्य संस्कृति- सैंधव संस्कृति। एक वर्चस्व वाद,शोषण  की संस्कृति है,जिसमें श्रम की महत्ता नहीं है,दूसरी हीनमनोभाव वाली,शोषित होनेवालों,श्रम को अपने जीवनयापन का साधन बनाने वालों की संस्कृति है। पुराणों,रामायण,महाभारत में कल्पित पात्रों के माध्यम से इन दोनों संस्कृतियों के संघर्ष को अभिव्यक्ति की गई है।जो ग्रंथ रचे गये हैं, उनमें श्रम के लुटेरों का वर्चस्व दिखाया गया है और शोषितों के श्रम का अपमान किया गया है। जब वर्चस्ववादी संस्कृति के प्रतीकों को लेकर जश्न मनाया जाता है,तब शोषितों की संस्कृति के प्रतीकों को अपमानित करने के प्रति जागरूक बहुजन अपना विरोध व्यक्त करते हैं। इसी विरोध को उजागर करने के लिये  दशहरा,दीपावली,दुर्गापूजा,होलिका दहन की कथाओं का पुन: पाठ प्रस्तुत करते हैं।लोगों को लगता है कि हिरण्यकशिपु, बाली, महिषासुर आदि को अकाल्पनिक और रामादि को काल्पनिक मानते हैं। ये सभी कथाये दो संस्कृतियों के बीच संघर्ष के प्रतीकों की हैं। राम को सच मानकर उनकी पूजा होगी तो रावण को भी सच मान कर लोग उनकी पूजा कर सकते हैं।

2 अप्रैल 2021 

योगी सरकार का सवर्ण वर्चस्ववादी फैसला।
१,फरवरी,२०१९ तक दो से चार वर्ष से लंबित भर्ती वाली जो परीक्षायें / साक्षात्कार आयोजित न हो सकीं,उनमें भी आर्थिक आधार पर ईडब्ल्यूएस के लिये अधिकतम १०% आरक्षण दिया जाय। १०% आरक्षण १८ फरवरी,२०१९ को जारी शासनादेश से लागू था। शासनादेश के तहत १,फरवरी २०१९ या इसके बाद की अधिसूचित/ विज्ञाफित रिक्तियों पर लागू होना‌ था।इस शासनादेश को अधिनियम का हिस्सा मानकर अधिनियम की धारा १३ में यह व्यवस्था उन रिक्तियों पर भी‌ प्रभावी कर दी गईं जो १ ,फरवरी,२०१९ से पूर्व विज्ञापित कर दी गईं थीं। लेकिन उनकी परीक्षा इस तिथि के बाद आयोजित की गईं या की जानी प्रस्तावित हैं। परस्पर विरोधी प्रावधान के कारण भर्तीयां लंबित रहीं,परीक्षा/ साक्षात्कार नहीं आयोजित हुये। अब हो रहा है।
आरक्षित वर्ग‌ के राजनेता/ कार्यकर्त्ता,सामाजिक संगठन/ सामाजिक कार्यकर्त्ता, जातीय संगठन/नेता,विधायक/ सांसद,केन्द्र/ राज्य स्तरीय मंत्रु इस मुद्दे पर मौन हैं।
अब जब २०२२ में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है,वोट की फसल काटने के लिये सवर्णों को खुश किया जा रहा है और आरक्षित वर्ग को भी नौकरी पाने का लालच दिया जा रहा है,झुनझुना बजाने को बहुत है.




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