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उर्मिलेश :
बहुत दुखद। आपसे मेरी दिल्ली मे ही दो-एक बार की अच्छी मुलाकात रही है। कलाकार-मित्र लाल रत्नाकर जी ने मिलवाया था। सादर श्रद्धांजलि और परिवार के प्रति शोक संवेदना।
राकेश यादव (लखनऊ) :
अखिल भारत वर्षीय यादव महासभा ( उतर प्रदेशीय इकाई के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष) सामाजिक न्याय, गैर बराबरी और बहुजन वैचारिकी के लिए जीवनपर्यंत काम करने वाले #DrManraj_Shastri जी का कोरोना से निधन हम सभी लोगों के लिए अपूरणीय क्षति है आपका मार्गदर्शन और सहयोग हम लोगों के लिए जीवन पर्यंत अनुकरणीय रहेगा
मनराज शास्त्री जी को नमन और श्रद्धांजलि.
आप के सुझाव और सलाह के साथ हम लोगों को सदैव याद आएंगे।
पुनः नम्र श्रद्धांजलि
।
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सामाजिक न्याय के सजग प्रहरी और बहुजन समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक नेता का असमय चला जाना।
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डॉ. मनराज शास्त्री जी का जन्म 01 जुलाई 1941 को जौनपुर जनपद के बटाऊबीर के पास सराय गुंजा गांव में हुआ । इनका निधन वाराणसी में एक प्राइवेट अस्पताल के icu में दिनांक 16 अप्रैल 2021 को शाम 5:00 बजे हो गया।
इनकी आरंभिक शिक्षा दीक्षा पास के प्राइमरी स्कूल से शुरू होकर सल्तनत बहादुर इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा के उपरांत इन्होंने अपनी स्नातक तक की बदलापुर डिग्री कॉलेज से की आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय गये और वहीं से इन्होंने संस्कृत विषय में एम ए और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। तदुपरांत यह राजकीय महाविद्यालय की सेवा में इसलिए आ गए कि विश्वविद्यालयों में उस समय भी तमाम नियुक्तियों को लेकर के काबिलियत की वजह अन्य बहुत सारे कारण, कारण बन जाते थे। राजकीय महाविद्यालय से जब शाहगंज डिग्री कॉलेज के लिए प्रिंसिपल की पोस्ट विज्ञापित हुई तो उसके लिए इन्होंने विज्ञापन भरा और इनका चयन हो गया इन्होंने गन्ना कृषक महाविद्यालय शाहगंज में प्रिंसपल के रूप में कार्य करना आरंभ किया।
ज्ञातव्य है कि शास्त्री जी जब विद्यार्थी थे तभी यह सामाजिक विचारधारा को लेकर के बहुत सशक्त और आने वाले दिनों में चौधरी चरण जैसे किसान नेता के संपर्क में आए और उनके सिद्धांतों को इन्होंने अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया। इसी माध्यम श्री रामस्वरूप वर्मा के संपर्क में आए। बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा के संपर्क में आए। इन सब के संपर्क में आने की वजह से आने की वजह से वह अर्जक संघ के प्रचारक के रूप में भी कार्य करने लगे तमाम शादी विवाह अर्जक पद्धति से उन्होंने संपन्न कराए।
इसके साथ लंबे समय तक अखिल भारतीय यादव महासभा की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रहे और समाज के लिए बहुत बड़ा काम किया सेवा में निवृत्ति के उपरांत वह निरंतर शिक्षा के प्रचार प्रसार में लगे रहे और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ अभियान में सहयोग करते रहे।
दिनांक 16 अप्रैल 2021को एकाएक वह है करोना की चपेट से बच नहीं पाए और सायं 5:00 बजे उनका देहावसान हो गया।
विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति में समाजवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक के रूप में शोषित और दलितों और पिछड़ों के हित की हमेशा बात करते रहे।
माननीय मुलायम सिंह यादव जब राजनीति में शुरुआत कर रहे थे तो उन दिनों यह सारे लोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय और शिक्षा जगत में समाजवादी आंदोलन को गति दे रहे थे जिससे माननीय मुलायम सिंह जी की विचारधारा के समर्थक होने के साथ-साथ उनके राजनीतिक आंदोलन में अनेकों तरह से सहयोग किए।
हालांकि इनके बहुत सारे साथी सपा सरकार के विभिन्न पदों पर विराजमान रहे लेकिन इन्होंने कभी भी किसी पद को हासिल करने की इच्छा जाहिर नहीं की और वह निरंतर निरपेक्ष भाव से समाजवादी आंदोलन के हिमायती बने रहे यहां तक की जब से श्री अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे हैं तो उनके कामों की प्रशंसा और उसके प्रचार-प्रसार की हमेशा बात करते रहते रहे हैं, श्री अखिलेश यादव से भविष्य की राजनीति की उन्हें बहुत बड़ी उम्मीद रही है उम्मीद है कि आने वाले दिनों में उनकी उम्मीद फलीभूत होगी।
यद्यपि राजनीतिक रूप से उन्होंने लंबे समय से किसी खास दल के प्रति वह लगाओ नहीं था लेकिन भाजपा के प्रति उनका बहुत बड़ा प्रतिकार था और वह निरंतर इस बात से बहुजन समाज को समझाने की कोशिश करते रहते थे कि यह दल और इसका मूलभूत संगठन बहुजन समाज के विनाश का बहुत बड़ा जहर अपने अंदर पाले हुए हैं।
9 अप्रैल 2021 :
प्रयाघगराज बसस्टैड के मिसयैनेजमेंट के कारण पैसेंजर निजी बस से जाने को विवश। सरकारीकर्मचारी ही निजीकरण को प्रोत्साहन देते हैं।
8 अप्रैल 2021 :
लड़ते हैं आपस में ईश्वर और अल्लाह के बंदे। आसमां में कभी उनकौ लड़ते देखा है अंधे।।
7 अप्रैल 2021 :
परम प्रिय अखिलेश जी ! राष्ट्रीय अध्यक्ष ,समाजवादी पार्टी। परिवार के सदस्यों की अतिशय महत्त्वाकांक्षा के चलते आप की राजनीति में कांटा लगने वाला है।त्याग की भावना का सदस्यों मेंअभाव है। आप को सामंजस्य बैठाना है। अगर सामंजस्य नहीं बनता है तो निर्मम बनना पड़ेगा और जनता आप का साथ देगी, बशर्ते उचित भागीदारी को प्रश्रय देंगे।कृष्ण की मुस्कान ही नहीं,बलराम का क्रोध भी चाहिये।
7 अप्रैल 2021 :
अपने रास्ते से हटने के बहाने अनेक होते हैं। सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते लोग फिसल जाते हैं।
7 अप्रैल 2021 :
जितनेfalse narrativesसंघ और भाजपावाले गढ़ते हैं,उतना कोई और नहीं।खूबी यह है कि गोदी मीडिया के साथ मिलकर इसकादोष दूसरों पर मढ़ देते हैं।आरक्षण के संबंध में मोदी का झूठ स्वत: उजागर हैं।जब सरकारी संस्थायें नही रह जायेंगी और उनका निजीकरण हो जायेगा ,तब आरक्षण कहां रहेगा,मोदी जी।निजी संस्थाओं में आरक्षण होता नहीं। दूसरे,आप ने आरक्षण को समाप्त करने के लिये
लेटरल एंट्री का चोर दरवाजाभी खोल दिया हैं।मोदी जी! आप अपने को बहुत चालाक समझते हैं,हमारे गांवों में ऐसे चालाक लोगों को घाघ धूर्त कहा जाता है।
7 अप्रैल 2021 :
पिछड़े दलित आदिवासी बाजारों में धन का प्रबंध करके दुकानें खोलें और आपस में ही खरीद- बिक्री करें ताकि समय आने पर इनका बहिष्कार किया सके! बनियों का सारा व्यापार हमसे चलता है और ये ब्राह्मणों के साथ मिलकर हमारा विरोध करते हैं! हमारे खिलाफ भारतबंद.कर रहे हैं!अब हमें हर बात के लिये तैयार रहना होगा! जबतक इनका बहिष्कार नहीं होगा,ये हमको दबा कर ही रखेंगे!
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तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते
मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते
जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते
ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते
बिसाते-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते
वसीम जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते...
...............प्रो.वसीम बरेलवी
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DrManraj Shastri
6 अप्रैल ·
Brijesh Yadav
4 अप्रैल ·
हिन्दी के एक अध्यापक से बातचीत
भक्तिकाल, सांस्कृतिक नाश का काल है। जो लोग भक्तिकाल को 'सांस्कृतिक जागरण' मानते हैं, वे लोग भी (भाजपा की बढ़त और मोदी की पैदाइश से बढ़कर) समाज में फैलते जा रहे लम्पटीकरण के उत्तरदायी हैं।
यह सुनकर माटसाब ने कहा कि हम तो समाजसेवा कर रहे हैं।
हमने कहा, समाजसेवा सचेत-स्वतंत्र आदमी का काम होता है। नौकर कभी समाजसेवा नहीं करता। ग़फ़लत में रहने की ज़रूरत नहीं है। जो मास्टर 'नाश' को 'जागरण' बता रहा है, वह विद्यार्थियों को उल्टा लटका रहा है, वह ख़ुद भी लटका हुआ है। वह समाज के ख़िलाफ़ काम कर रहा है। वह इतिहास के ख़िलाफ़ काम कर रहा है।
नाश का मतलब ह्रास की शुरुआत काफी पीछे से हो चुकी थी। राम और कृष्ण को अवतार बताकर शक्ति शील सौंदर्य के जो प्रतिमान खड़े किये गये, वह बाकायदा वैचारिक ठगी का मामला है। विरोधियों को भी बताया गया कि भजन कर रहे थे, वे भी भक्त थे, वे भी भगवान का ही नाम ले रहे थे। अवतारवादी दर्शन की यह प्रभुता बुद्ध के देश में सांस्कृतिक तख़्तापलट की कार्यवाही थी।
हिन्दी साहित्य का शिक्षण तंत्र जिन भक्तों का थोक उत्पादन कर रहा है, किया है, वे सनकी बौड़म एकदिन समाज के कपार पर चुरेंगे - यह बात कई लोग कह चुके हैं जिनमें एक परसाई जी भी हैं।
उन्होंने कहा, मतलब ?
हमने कहा, पिटाई खाने के लिए तैयार रहिए। जो 'समाजसेवा' आप लोग कर रहे हैं उसकी यही 'उपलब्धि' है। 'आपन तेज सम्हारो आपै'।
लेकिन हमने तो यही पढ़ा है, यही हमें पढ़ाया गया है, हम क्या करें, उन्होंने भोलेपन से कहा।
हमने कहा, बाबूगिरी और मास्टरी में अंतर है। अगर आपकी इतिहास चेतना काम नहीं कर रही है तो मास्टरी काहे ला कर रहे हैं। चूँकि आपको नहीं पता कि आपने क्या पढ़ा है, आपको नहीं पता कि आप पढ़ा क्या रहे हैं इसलिए आपको यह भी पता नहीं पड़ेगा कि समाज में इतने गुंडे कहाँ से बढ़ते चले आ रहे हैं। होनहार, देशभक्त, माता के मुरीद, बौड़म।
यानी पिटना तय है?
हमने कहा, बिल्कुल। व्यक्ति को बरी करना चाहते हैं तो कहिए सलेबस की समस्या है, आलोचना का दोष है। लेकिन मास्टर को बरी नहीं कर सकते। मास्टरी का मामला थोड़ा अलग है। मास्टरी सबके वश की चीज़ नहीं हो सकती।
सलेबस में क्या समस्या है - उन्होंने पूछा।
हमने कहा - हिन्दूवादी राष्ट्रवाद। हिन्दी का मास्टर हिन्दूवादी भ्रष्ट चेतना के कैरियर है - यह बात आपके संग्यान में होनी चाहिए कि आप समाज में गंदगी बढ़ा रहे हैं जो दृष्टि, बोध से मूल्य स्तर तक पहले ही गचागच फैली हुई है ? आपके वैचारिक दृष्टिहीनता की जड़ ब्राह्मणी सामंतवाद है।
मसअला हिन्दू का है। इस पर गौर करने की ज़रूरत है। छह साल से तो खुलेआम चल रहा है। क्या वजह है कि उनका प्रचार तंत्र इस दर्जा सफल है कि आप दुष्प्रचार का जवाब भी ठीक से नहीं दे पा रहे हैं, अपने पक्ष का प्रचार करने को कौन कहे। आप हिन्दूवाद को क्यों समझना नहीं चाहते? आप हिन्दू की ठगबाजी का सामना क्यों नहीं करना चाहते? छह साल से फुटहा बाजा बज रहा है, आप न उसका काम देख रहे हैं, न उसका भाषण सुन रहे हैं, बर्बादी का विकास कौन देखेगा? आप भारत की संस्कृति-परम्परा को नहीं बूझ पा रहे तो विद्यार्थियों से क्या अपेक्षा करें?
वे दिन गए जब सत्ता के संस्थानों में बैठकर वामपक्ष का बेड़ा गर्क किया गया। लोग प्रगतिशील भी बने रहे। आज की तारीख में मास्टरी करना है तो विपक्ष में खड़ा होना पड़ेगा। प्रगतिशील होना है तो इस पूँजीवादी सत्ता और इस मनुवादी सलेबस के ख़िलाफ़ खड़ा होना पड़ेगा - सशरीर। नौकर कभी मास्टर नहीं हो सकता। जिसको गुरू कहते हैं वह गुरू कहलाता ही इसलिए है वह हिन्दू के नाम पर थोपे गये भक्ति भजन भगवान का विरोधी था।
ऐसा नहीं है कि प्रगतिशीलता का डिपार्चर प्वाइंट बदल गया है, बात यह है कि पिछली पीढ़ी के पहरेदारों ने जिस तरह सरकारी गुलगुला चभका है, उसका नतीजा यह पीढ़ी भुगत रही है। आगे और दुर्गति धरी है।
कबीर और तुलसी दोनों यदि प्रेम की धारा बहाएंगे तो पिटने की वजह भी सपष्ट नहीं हो पाएगी। संकट इतना विकराल है कि अध्यापक को नहीं पता कि वह भीड़-तंत्र पैदा कर रहा है, कि उसके पाठ्यक्रम का लक्ष्य आवारा-लुच्चा तैयार करना है; विद्यार्थी को नहीं पता कि पढ़ाई क्या है, नौकरी क्या है, भक्ति क्या है, देशभक्ति क्या है। गुरू जब ख़ुदै हक़ीक़त का सामना नहीं कर रहा है, बल्कि शासकवर्गीय प्रपंच में भरमा पड़ा है, तो रैदास, मलूकदास की विशेषता कौन बतावेगा।
भक्तिकाल का मुख्य अन्तर्विरोध भक्ति-भजन-भगवान है। हिन्दी आलोचना ने समर्थन-विरोध को एक ही धार में तौलने के लिए क्या क्या पैंतरा चला है, देख लीजिए। सामंत बनाम किसान, सवर्ण बनाम शूद्र, लोक बनाम शास्त्र। ईश्वर के सम्मुख जो बराबरी बताई जाती है, वह एक छल है, कवियों ने अपनी बात कहा भी है, लेकिन आलोचना को तो जागरण दिखलाना था, हक़ीक़त जो भी हो।
वे लोग भी तो प्रगतिशील कहलाते हैं जो भक्तिकाल को जागरणकाल मानते हैं ?
हाँ हाँ, इन्हीं लोगों ने तो कोढ़ में खाज फैलाया है। ये लोग रूलिंग क्लास के बाबू ठहरे। नौकरी का दाम अदा किये हैं। वे वस्तु-तथ्य से नहीं, अखण्डता-महानता की धारणा से संचालित हैं। नतीजा यह है, ऐसी फँसान खड़ी हो गई है कि माटसाब! आप खुद भी चाहें तो अपने को पिटने से नहीं बचा सकते। सरकारी गुलगुला खाकर जो तथाकथित प्रतिरोध आप लोग कर रहे हैं, आपके जो तथाकथित सामाजिक सरोकार है, क्षमा दया के आपके जो आत्मघाती संस्कार हैं, उधर यह देश बिका जा रहा है, इधर आप समाजसेवा कर रहे हैं, क्या पढ़ा रहे हैं आप, बच्चों को अँधेरे में ढकेल रहे हैं, भक्ति को जागरण बता रहे हैं, शासक वर्ग का कूड़ा ढो रहे हैं, आपको शर्म भी कहाँ से आएगी!
नयी पीढ़ी का जो हाल है, इसका जिम्मेदार कौन है, इसका ठींकरा केवल मोदी के सर नहीं फोड़ सकते। इस भीड़-तंत्र की पैदाइश में आपका भी किरदार है। भीड़-तंत्र का जो सिपाही है वह केवल बौड़म नहीं नहीं होता, वह सधा हुआ बौड़म होता है। ज्ञान, सत्य के हर अँखुए को चबा जाएगा वो। समझ लीजिए, मरवाने के अलावा अब दूसरा कोई रास्ता नहीं बच रहा आपके पास। आप लोगों में भी, सबसे पहले उनका नम्बर आएगा जो शांतिपूर्ण भेदभाव के हिमायती हैं या कहिए सचेत होने की दिशा में हैं।
इसका मतलब, मैं भी भीड़-तंत्र का हिस्सा हूँ क्या? अब रास्ता क्या है - उन्होंने हताश स्वर में पूछा।
हमने कहा, एक तो ब्राह्मणी हिन्दूवाद की मर्यादा- प्रतिष्ठा बताने वालों को ठीक करना होगा। दूसरा, 'साँचाबद्ध चिंतन' के विरोधियों का दिमाग़ सही करना होगा। तीसरी, सबसे ज़रूरी बात कि इतिहास - दृष्टि को जगाना होगा ... लेकिन समझने का चक्कर छोड़िए, आपको बता दिया जाएगा तो भी आपके भेजे में कुछ हलेगा नहीं। आन्दोलन आपकी समझ में तब भी नहीं आएगा जब आपकी संस्था का निजीकरण हो जाएगा।
हमारी आपके साथ पूरी सहानुभूति है माटसाब ! हम तो कहेंगे कि होश में रहकर काम कीजिए ताकि बढ़िया से मराइये। आपका पिटना मुद्दा बन जाएगा तो इधर से रास्ता बनेगा। आपकी पिटाई में ही अब आपकी भलाई है। साहित्य की, समाज की, भविष्य की भलाई के लिए अब आपकी पिटाई ज़रूरी है। आप रास्ते की बात कर रहे थे न ! इसलिए सही मुद्दे का ख़्याल कीजिये। राजनीति बूझिये। क्लास को आपरेट करते हुए देखिये। साहित्य, वर्ग विभाजित समाज का आईना है।
इसी के साथ हम दोनों उठ खड़े हुए।
03 . 04 . 2021
DrManraj Shastri
3 अप्रैल 2020 ·
राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री के संबोधन ने निराश किया।कोरोना से लड़ने में१३० करोड़ देशवासियों की सामूहिकता पर गर्व के साथ ५ अप्रैल को रात ९ बजे९ मिनट तक घर में अंधेरा करके दिया,मोमबत्ती,टार्च या मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाने का ताली,थाली,घंटी बजाने के आह्वान की तरह आह्वान तक उनका संबोधन सीमित रहा। इसमें गरीब मजदूरों,रिक्शा- ठेला चलाने वालों,दिहाड़ी वालों,नाई- मोची जैसे रोज कमाने खाने वालों,छोटेबनियों की तकलीफों और उनके निवारण का कोई जिक्र नहीं।१४ अप्रैल के बाद क्या होगा,लाक डाउन कैसे शिथिल होगा,कोरोना से लड़ने के लिये स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा के उपाय क्या और केसे होंगे इत्यादि पर कुछ भी नही कहा।ऐसा लगा कि अन्य संघियों की तरह मोदी जी भी केवल आसमान देखते हैं,जमीन नहीं।क्या कहें--- भूखे भजन न होई गोपाला।मोमबत्ती जलाने के लिये पैसे होनेचाहिये,मोमबत्ती,माचिस बाजार से आयेंगी,मुफ्त नहीं मिलेंगी। कितने ही घर होंगे जो पैसे के अभाव में पी.एम. की इच्छा का पालन न कर पायेंगे। क्या प्रधाधम़त्री के संबोधन में इसका संकेत था?
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कलुषित मन
दूषित हो तन
प्रतारणा हेतु
मर्कटनर्तन
करता नर
बहुविध स्वांग
रचाकर
हर दिन
नित नूतन
बचन प्रचारित
करता
उद्वेलित
जन-मन
अंध अनुकरण
विवश
अकरणीय
करने को
उत्सुक
उद्यत
करता
कितना
अच्छा
लगता है?
DrManraj Shastri
31 मार्च ·
१,अप्रैल से बदलने वाले दस नियम:-
१. नया वेज कोड-पीएफ,ग्रैच्यूटीजमा राशि बढ़ेगी,इन हैंड सेलेरी कम।कर्मचारी भत्ता कुलवेतन के५०% से ज्यादा नहीं।
२.ईपीएफ अंशदान-१अप्रैल से ईपीएफ में २ .५ लाख सेअधिक जमा पर व्याज टैक्सेबुल।दो लाख से अधिक प्रतिमाह वेतनपानेवाले इस दायरे में।३. निष्क्रिय हो जायेगा पैन-आधार से न जोड़ने पर३१ मार्च के बाद निष्क्रिय।४. नये वित्त वर्ष से आयकर विभाग पहले से भरा आईटीआर फार्म मुहैया करायेगा। ५. रिटर्न भरने से छूट-७५ वर्ष से अधिक उम्र वाले वरिष्ठ नागरिकों को रिटर्न भरने से छूट,उनको जिन्हें केवल पेंशन और एफडी के व्याज से ही आय होती है।६. पुरानी चेकबुक मान्य नहीं-देना बैंक,विजया बैंक,कार्पोरेशन बैंक,ओरियंटल बैंक आफ कामर्स,आंध्रा बैंक,यूनाइटेड बैंक,इलाहाबाद बैंक की चेकबुक अमान्य।सिंडिकेट बैंक की चेकबुक ३० जून,२०२१ तक मान्य।७.-ई ई-- इनवायस जारी:-बिजिनेस टू बिजिनेस,(बी टू बी )कारोबार के तहत।५० करोड़ सेअधिक वार्षिक टर्न ओवर वाले कारोबारी के रिमेक ई- इनवायस जरूरी।दायरे में ९० लाख कारोबारी।८.दोगुना टीडीएस:-आयकर ,धारा२०६ एबी के तहत जो रिटर्न नहीं भरेगा,टीडीएस दो गुना कटेगा।९.डाकघर बचत खाते से लेनदेन पर शुल्क:-जमा या निकासी के अलावा आधार आधारित पेमेंट सिस्टम शुल्क देना होगा। इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक के मुताबिकफ्रीलेनदेन की सीमा खत्म होने के बाद लिया जायेगा।
१०.नान -सेलेरीड क्लास से ज्यादा टीडीएस लिया जायेगा:- जैसे फ्रीलांसर्स,टेक्नीकल सहायक को अतिरिक्त टैक्स देना पड़ सकता है।७.५०% से१०%हो सकता है।
















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