कविताएँ

कविताएँ  

कितना नीरस लगता है
बिना कुछ किये घर में
अकेले बैठे रहना
सुबह उठे
बाउंड्री के भीतर
पेड़ की सूखी ,गिरी
पत्तियां बुहारी
आधा घंटा घूमे
चाय पी चुके थे
घूमकर शौच गये
हाथ धुले,ब्रश किये
इंसुलिन निकाल कर
लगाने के समय का
इंतजार किया
समाचार पढ़ते हुये
मन में आते,चलते
विचार टंकित किये
स्मार्टफोन पर
इंसुलिन सिरिंज में
उदर में लगा
आधा घंटा बेसब्री से
नाश्ते के आने की
मधुर प्रतीक्षा की
डायटीशियन के निर्देश का
पालन करते हुये
दो रोटी और सब्जी
पेट में ठूंस लिया
फिर एक कप दूध ले
नौ बजे तक का समय
यों ही गुज़ार दिया
न कहीं आना
न कहीं जाना
बैठे- बैठे
फेसबुक चलाना
यह भी कोई जीवन है।

डॉ मनराज शास्त्री
2 अप्रैल 2021
( आगे की करनी फिर)।।

( २ )




एक थी निर्भया
और एक थी मनीषा
कितना फर्क होता है
सवर्ण और दलित की
सुंदर,सलोनी बेटी होने में
अलग- अलग होते हैं
सुख -दु: ख,दर्द और खुशी के
समाज द्वारा गढ़े गये मानक
लालन- पालन और घटनायें
एक सी होने पर भी लोगों की
प्रतिक्रियायें जुदा- जुदा होती हैं
निर्भयास़ंग होती है दरिंदगी
गुप्तांग में उसके शैतानों ने
घुसेड़ दीं लोहे की राड
चीखी,चिल्लाई छोड़ने बचाने की
पुरजोर की गुजारिश और कोशिश
लेकिन हैवानियत रुकी नहीं
फेंक दी गई लावारिस,साथी चोटिल
खबर छपी अखबारों में
सारा भारत विचलित,विगलित हो गया
शहर दर शहर कैंडिल जला कर प्रदर्शन हुये
उत्तर से दक्षिण,पूरब से पश्चिम
संस्कृति के रखवालों का शोर
सरकार पर निशाना,शैतानों पर चीत्कार
फांसी दो,फांसी दो की चतुर्दिक ललकार
उसके दर्द की अनुभूति हर दिल हर ओर
संवेदना,सहृदयता का गगनभेदी स्वर
भारत से सिंगापुर तक
उसको बचाने की कोशिश
क्या कुछ नहीं किया,पर रहे नाकाम
ऐसी ही हृदयविदारक घटना घटी
हाथरस में सफाईकर्मी की बेटी संग
नाम था मनीषा,अल्हड़ जवान थी शायद
सवर्ण युवकों की आंखें लगी थीं उस पर
हुआ जोर जुल्म उसके साथ
अंग प्रत्यंग तोड़े गये,राड़ का भी प्रयोग
परिजन रोते,गिड़गिड़ाते
लेकिन थाने में रिपोर्ट तुरत लिखी नहीं
अलीगढ़ में बेमन से अस्पताल में
पुलिस प्रशासन ने भर्ती कराया
बहुत से तथ्य छिपाये गये
न अखबार,न संस्कृतिरक्षक न कै़डिल मार्च
कोई चुप तो कोई शांत ,कोई हलचल नहीं
अपराधियों को बचाने की पूरी कोशिश
परिजन दोषी ठहराये जाने‌ लगे
आनर किलिंग का मामला बनाया जाने‌ लगा
आखिर अस्पताल में हालत बिगड़ने‌ लगी
उसे दिल्ली भेजा गया पर‌ वह न बची
उसका शव घर लाया गया
पर घरवालों को नहीं दिखाया गया
रात के अंधेरे में उसको जलाया गया
न पिता ने‌ देखा,न माता ने ,न भाई ने
तरह- तरह के दबाव,धमकियां आने लगीं
गुनहगारों की जातीय पंचायतें होने लगीं
सभी सवर्णों में मच गई खलबली
मूंछों की इज्जत बलबलाने‌ लगी
प्रदेश के मुखिया बहुत तमतमाये
तुरत जांच कमेटी बनायें और उलझाये
एसआईटी से सीबीआई तक जांच कर चुके
परिणाम आजतक कुछ मालूम नहीं
बेटियां बेटियां हैं मगर
जातियां ऐसा मानती नहीं
कोई बेटी है इज्जत मां- बाप की
कोई बेटी खिलौना है बडी जाति की
देखिये आप अपनी आंखें खोल कर
पैदा इसी देश में हुई निर्भया
मनीषा भी पैदा इसी देश में।

डॉ मनराज शास्त्री
1 अप्रैल 2021

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