रविवार, 7 फ़रवरी 2021

एहसास की स्मृतियां

 "एहसास की स्मृतियां"


(आधी आबादी की चमक फीकी न पड़ जाए । इस बात का एहसास रहे कि हमारी सुंदर दुनिया के पीछे एक सुंदर मन हमेशा हमारे साथ खड़ा रहता है बिना किसी अतिरिक्त पहचान के वह पूरा सहयोगी होता है। यही प्रकृति का विधान है और इसे ही जीवन का एहसास भी कहते हैं ऐसे ही एक व्यक्तित्व की हल्की सी चर्चा।)


मुझे ठीक से याद नहीं है कि मैं कब से शास्त्री जी के परिवार के साथ अति अंतरंगता से जुड़ गया लेकिन यह जरूर याद है कि बचपन से ही शास्त्री जी के सांस्कृतिक,सामाजिक और शैक्षणिक योगदान के बारे में सुनता रहा और कोशिश रही कि उनके सिद्धांतों पर चलने की कोशिश करूं।

स्वाभाविक है यह सब मेरे परिवार से उनके ताल्लुक (सम्बन्ध) और आने जाने का परिणाम था . पिता जी चाचा जी का वह दौर जो समाज के सभी सुधिजनों को आकर्षित करता रहा और उनके विमर्श और विचारों ने इतना अभिसिंचित  किया कि जिस सामाजिक पहचान की परिकल्पना की जाती है उसके पीछे बहुत बड़ी फेहरिस्त है जिसमें शास्त्री जी का स्थान सर्वोपरि बना रहा और आज भी है।

जीवन में आप के पास जो सबसे बड़ी संपत्ति और धरोहर होती है वह होती है अच्छे एवं विचारवान लोगों की संगति।

जो केवल आपके समर्थक ही नहीं होते आपके निंदक भी होते हैं निंदक से तात्पर्य है गलत बातों के समर्थक ना होना, बहुत सारे ऐसे बिंदुओं पर शास्त्री जी हमेशा सही मार्ग की तरफ निर्देशित करते रहे हैं जो त्रुटि विहीन हो। और यह सब होता है आपसी विमर्श से शास्त्री जी का अनुभव शास्त्री जी का ज्ञान शास्त्री जी का सांस्कृतिक विचार कोई एक दिन में नहीं बना है सतत प्रयत्न और साधना का परिणाम रहा है जितना उन्होंने पढा है उससे ज्यादा उन्होंने कढा है। विपरीत परिस्थितियों में भी जिस साहस और हिम्मत के साथ वह खड़े रहते हैं निश्चित तौर पर इन सब के पीछे एक बहुत बड़ी शक्ति काम करती है जहां मन की पवित्रता होती है विश्वास होता है लोभ नहीं होता, वही शक्ति का स्रोत होता है मुझे लगता है डॉ साहब के लिए उसी शक्ति की स्रोत थी माताजी अनेकों अवसरों पर मैंने देखा बहुत गंभीर सवाल खड़े करती थी और डॉ साहब हंस करके उन सवालों को उत्तरित कर देते थे, और वह गहरी उच्छास में बहुत गंभीरता से उसे वह स्वीकार लेती थी और किसी न किसी रूप में डॉ साहब उसे पूरा करते रहते थे।

उनकी चिंता एक बड़ी चिंता थी जिसमें परिवार ही नहीं समाज के वह सारे लोग थे, जिन्हें वह स्मरण रखती थी, कितनी विशालता थी उनमें जिस का आकलन करना सामान्य जन के लिए बहुत मुश्किल काम है मैं डा साहब के साथ बैठा जब यह चर्चा कर रहा था कि अचानक उनको क्या हो गया ? उसी चर्चा में डा साहब ने बताया एक दिन पहले की बात है वह यह कह रही थी सीमा* और उनकी मम्मी आई थी हमसे नहीं मिली और वह चली गई मैं देख रही थी ! वह बाहर बैठी थी न जाने क्या क्या यह सब उनके मन की चिंता थी, क्योंकि मेरी श्रीमती जी रोज सवेरे मुझसे पूछती थी की माता जी के क्या हाल है? वह जानती हैं कि मेरी बातचीत डॉ साहब से प्रातः काल से लेकर रात्रि तक अनेकों बार होती है । तो उसमें उनकी चिंता माताजी का स्वास्थ्य हुआ करता था । जो इधर काफी दिनों से इसलिए भी था की माताजी से उनकी बातचीत नहीं हो पाई थी।

न जाने कितनी स्मृतियों को छोड़ गई हैं जब से वह अपने इलाज के लिए दिल्ली एम्स आने जाने लगी थी तो मेरे परिवार के साथ उनकी अंतरंगता निरंतर बढ़ती गई थी। जिसकी स्मृति उन्हें जाते-जाते भी बनी हुई थी उनका उलाहना उनकी बच्चों के प्रति लाड प्यार निश्चित तौर पर एक बहुत बड़ी मातृ शक्ति की संचेतना संवेदना और सहानुभूति पूर्ण स्नेह का संपादन और संकलन था।

निंदा तो करती ही नहीं थी बहुत शालीनता से शास्त्री जी के सांस्कृतिक सरोकारों का जिक्र करती थी और मन से स्वीकार करती थी । हमेशा उन्होंने सामाजिक सरोकारों का जो रूप प्रस्तुत किया निश्चित तौर पर इतना सूक्ष्म अनुभव बहुत विदुषी मातृ शक्तियों में भी नहीं होता। चिंटू को बिगाड़ने में चिंटू को बनाने का उनका सपना निश्चित तौर पर एक नानी का असली रूप था । हमेशा वह आश्वस्त थी क्योंकि चिंटू की सामर्थ्य पर उन्हें अटूट विश्वास था।

उनकी पोतिया उनके सपनों को पूरा करेंगी ऐसा उन्होंने उन्हें सिखाया है, राजेश और उनकी पत्नी के संघर्ष और सफलता से वह संतुष्ट थी।

मनोविनोद के भी उनके बहुत सारे प्रसंग जब कभी वह सुनाती थी तो नौकरी के मध्य गुजारे हुए दिन और उन दिनों के भोगे हुए सच का चित्र कितना सुंदर बनाती थी जिनमें उनके साथ रहे उन परिवारों का जो बाद में तत्कालीन निदेशक प्रिंसिपल और बहुत सारे लोग होते थे । जो निजी तौर पर निजी संबंधों में और निजी स्वभाव से कैसे थे उनका परिवार कैसा था सारा एहसास उनको स्मृत था और यही सब कुछ था उनकी गंभीर व्यक्तित्व का खजाना।

पहाड़ों की जिंदगी का सवाल हो या उसके बाद के बहुत सारे अनुभव उनकी स्मृतियों में सब कुछ समाहित थे हमने तो बहुत कम साथ रहते हुए भी इतना अधिक समझने का अवसर पाया है, जिन्होंने उन्हें ठीक से जिया है वह कितने समृद्ध हो गए उनके प्राकृतिक और माननीय सरोकारों से। 

श्री कृष्णा भवन वैशाली के प्रवास में भी जब भी मैं जाता था इतनी प्रसन्न होती थी इतनी प्रसन्न होती थी की हमेशा उनकी इच्छा रहती थी कि बच्चों से बगैर मिले वह वापस नहीं जाएंगी। हां तब वह जरूर नाराज होती थी जब मैं अपनी श्रीमती जी को नहीं लेकर जाता था। मैं उन्हें आश्वस्त करता था कि आपकी मुलाकात हमसे होगी अक्सर यह प्रयास रहता था कि वह एक बार घर आकर सबसे मिलकर जरूर जाए।

डॉ साहब ने उनके स्वास्थ्य के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी अभी एक दिन पहले ही तो उन्हें लखनऊ के सहारा अस्पताल से दिखा कर के ले आए थे, पूरी उम्मीद थी कि मौसम बदल रहा है सर्दियों के दिन कम हो रहे हैं धूप निकलने लगी है वातावरण में गर्मी बढ़ रही है और वह धीरे-धीरे धूप में टहलेगी  और स्वस्थ हो जाएंगी, दवाओं के साथ फिजियो थेरेपी की सलाह डॉक्टर ने भी दिया था कि उनको नियमित रूप से एक्सरसाइज इत्यादि कराया जाए, यह सब बातचीत तो सुबह-सुबह डा साहब से हुई थी और मैं भी आश्वस्त था कि धीरे-धीरे वह स्वस्थ हो जाएंगी। लेकिन कौन जानता था 4 फरवरी 2021 के प्रातः काल (9-10 बजे के आसपास) जब उन्हें धूप में ले जाने के लिए चिंटू बाहर ला रहे थे तो वह बीच में ही बैठ गई थी फिर जो कुछ हुआ वह इतने गहरे एहसास में डुबो दिया जहां स्वत: पूर्ण विराम ही लग जाता है, असंख्य स्मृतियों के साथ।

एहसास बना रहे इसलिए भी........!


-डा.लाल रत्नाकर


(कैनन के डिजिटल कैमरे से लिया गया चित्र जो लगभग 1990  के आसपास का होगा तब का जब मोबाइलों में कैमरे नहीं हुआ करते थे)

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